Wednesday, March 14, 2012



 
महाभारत के दो पात्र संजय और DHRITRASHTRA  अपने महाभारत काल से आज के युग में पहुँच जाते है ,समय के इतने लम्बे अंतराल की वजह से  यहाँ की हर विषय वस्तु उन्हें कितना आश्चर्य चकित करती है और इस परिस्तिथि में वो कैसे झेलते है इसी का एक काल्पनिक रूपांतरण मै अपने शब्दों में वर्नण करने की कोशिश कर रही हूँ
 
                             संजय और DHIRITRASHTRA  एक शादी में पहुँच जाते है
DHIRTRASHTRA -ये कौन सी और कैसी जगह है संजय?
संजय -               ये जगह कौन सी है ये तो पता नहीं महाराज परन्तु जगह बहुत ही खुबसूरत ढंग से सजा हुआ लग रहा है,चलिए अन्दर चलकर देखते है
DHIRTRASHTRA  और संजय शादी के मुख्यद्वार पर पहुँच जाते है,मुख्य द्वार पर खड़ा सिक्यूरिटी गार्ड उन्हें अजीब से वेश भूषा में देख कर उन्हें रोकता है
सिक्यूरिटी गार्ड     ऐ ,रुको ,रुको ऐसे मुह उठाये अन्दर कहाँ जा रहे हो ?
DHIRITRASHTRA ये कौन बतमीज इन्सान ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहा है ?
सिक्युरिटी गार्ड     यहाँ पर ड्रामा कंपनी वालो को नहीं बुलाया गया है ,यहाँ पर शादी हो रही है बीना आमंत्रण के अंदर नहीं जा सकते
DHIRITRASHTRA ये क्या बकवास कर रहा है ,क्या तुम्हे मालूम नहीं हम महाराजा DHIRITRASHTRA है ,हम से तमीज़ से पेश आओ
संजय                  ये महाभारत काल के महाराजा DHRITASHTRA  है
सिक्यूरिटी गार्ड    कौन से भारत के महाराजा है हमें नहीं मालुम यदि अन्दर जाना है तो थोडा माल इधर दो फिर जाने मिल जायेगा
संजय                 ये तुम किस माल की बात कर रहे हो ?
सिक्यूरिटी गार्ड    क्या सीधे अन्ना की INDIA AGENST CURRUPTION  से आ रहे हो जो बात समझ में नहीं आती ?
संजय                 ये अन्ना कौन है?
सिक्यूरिटी गार्ड   वही जो माल को इधर -उधर करने के सक्त खिलाफ है ,जो खुद तो बारह बारह दिन भूखा रखता है और हमारे पेट पर लात मरता है
संजय                हमें अन्दर जाना है और जाने दो  ,हमें बहुत तेज भूख लगी है
सिक्यूरिटी गार्ड  अन्दर जाके फोकट में  इतने मजे करोगे ,पहले कुछ दो इर जाने दे दूंगा
संजय                महाराज लगता है यहाँ जाने से फले कुछ भेंट देनी होती है ,ऐसा करते है की एक अंगूठी इस दवारपाल को दे देते है और चलते है .[और संजय अपि एक अंगूठी सिक्यूरिटी
                       गार्ड को दे देते है और अंदर को प्रस्थान करते है ]
                   संजय और DHIRITRASTRA  बहुत भूखे थे इसलिए वो सबसे पहले खाने के काउंटर की ओर जाते है ,वहां तरह तरह की चीजे थी लेकिन उनके समझ में नहीं आ रहा था की
                    क्या खाए  .सबसे पहले उन्हें CHAWMIN दिखता है
DHIRITRASHTRA   खाने को कुछ पेश करो संजय हमें बहुत तेज भूख लगी है 
संजय                खाने ओ तो बहुत कुव्ह है पर लाऊ क्या महाराज ये समझ में नहीं आ रहा है 
 DHIRITRASHTRA   क्यों ?
संजय               प्रतेक  चीज़ का सवरूप अपने आप में अनोखा है
DHIRITRASHTRA  क्या कहा धोखा है ?क्या यहाँ भी YUDHISTHIR के महल की तरह दिखता है जो होता कुछ और है,होता कुछ और है.
संजय                नहीं नहीं महाराज यहाँ एक ऐसी वस्तु है जो इतनी लम्बी है की जो लोगो के मुह के अन्दर जीतनी जाती है उतनी ही बहार रह जाती है .खाए तो खाए कैसे?
 जाना
 DHIRITRASHTRA  क्या फिर द्रौपदी की साडी जीतनी लम्बी है ?
संजय                नहीं नहीं महाराज  इतनी भी लम्बी नहीं  है 
DHIRITRASHTA  किसकी बात कर रहे हो ?तुम भी न अपनी अक्ल का इस्तेमाल नहीं करते .शब्दों में वर्णनं करके बताओ
संजय                 लम्बी तो हा परतु द्रौपदी के साडी जीतनी नहीं ,पतली है लेकिन  हमारी उंगली जितनी नहीं यह तो घुंघराले बालो जैसा प्रतीत हो रहा है परन्तु ये काले रंग का भी नहीं है
DHIRITRASHTRA  ये कैसा वर्णन है ,इसको समझना तो महाभारत की लड़ाई को समझने से भी ज्यादा मुश्किल है ,चलो कुछ जो हम खा सके और देखो,अपनी अतृप्त पेट को तरपत कर सके
संजय                    आपकी तृप्ति को शांत करने के लिए ही तो महाभारत से अब तक आपके साथ हूँ ,मन ही मन संजय सोचता है जो इतना खून पी के साथ नहीं हुआ वो अब खाने से क्या  
                            शांत होगा
तभी एक बच्चा वहां आ जाता है और उन दोनों को देखकर हँसाने लग जाता है
बच्चा                  ये आपने क्या पहन रखा है ?
संजय                     इसे वस्त्र कहते है वत्स
बच्चा                 WHAT  वास्तु एंड WHAT  वस्त्र
संजय                हे !बालक क्या तुम हमें खाने पीने की व्यवस्था की अहि जानकारी दे सकते हो ?
बच्चा               ऐ अंकल आप क्या बोल रहे हो मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है ?
संजय               हमें कच खाना है ,भूख लगी है ,खाना कहाँ मिलेगा ?
बच्चा           आप यहाँ से सीधे जाके बाये मुद जाना वहां खाने का स्टॉल है 
संजय                खाने की जगह का भी क्या नाक्शा  होता है   बालक ऐसा करो जरा हमारे साथ चलो 
बच्चा              ये हे हे क्या लगा रखा है और ये बालक बालक क्या लगा रखा है .बड़े अजीब लोग है यहाँ से तो कलटी होने में ही अपनी भलाई नज़र आती है 
                  और बच्चा वहां से चला जाता है  
                 शादी में पंडाल बहुत ही बड़ा बना हुआ था जहाँ खाने का स्टॉल बहुत दूर दूर बना हुआ था इसलिए उन्हें अन्य स्थान पर पहुचने के लिए बहुत चल चल कर जाना         पड़ता है जिससे दोनों परेशां हो जाते है 
DHIRITRASHTRA और कितनी दूर है ?संजय ,हमें खाने के लिए और कितना दूर चलना होगा ?
   संजय                महाराज लगता है ये लोग सिर्फ दिखाने  के बड़े है ,ये लोग
 खाना बचने के लिए इतनी दूर खाना रखा है की कोई वहां तक पहुँच ही न पाए 
 DHIRITRASHTRA  तो हमें पानी ही पीला दो 
संजय                     पानी भी तो कही आस पास नहीं दिख रहा है  
DHIRITRASHTRA काश! की आज अर्जुन होता तो यहाँ पर  तीर ही मार के पानी निकल कर मेरी प्यास बुझा देता ,जैसे भीष्म पितामह की बुझाई थी
संजय                     तो लड़ाई ही क्यों कराई थी ?आज इस तरह खाने पीने को तो दर दर नहीं भटक रहे होते
                      तभी उन्हें डी.जे .पर डांस कर रहे लोग दिखाई देते है
DHIRITRASHTRA   ये कैसी आवाज आ रही है ?
संजय                     एक जगह पर खड़े होकर बहुत सारे लोग अजीब तरह से हाथ पैर चला रहे है ,लगता है सोमरस का सेवन कर लिया है
DHIRITRASHTRA  अरे हमें भी वही पिला दो ,बहुत दिनों से गला तर नहीं हुआ है
संजय                     हाँ हाँ क्यों नहीं बस इसी की तो कमी रह गई थी
                          तभी वहां उन्हें वहां एक लड़की स्टेप डांस करती हुई दिखाई देती है
संजय                  महाराज यहाँ पर भी चीड़ हरण हो रहा  है
DHIRITRASHTRA  क्या द्रौपदी यहाँ भी पहुँच गई ?
संजय                     नहीं नहीं महाराज यह कन्या तो अपने वस्त्र अपने आप ही उतार रही है
DHIRITRASHTRA  ये क्या हो रहा है ?[चिलाते हुए ]
संजय                     महाराज आराम से यहाँ आपका राज -पाट नहीं है ,हम बहुत मुश्किल से भेंट देकर यहाँ तक पहुंचे है.
DHIRITRASHTRA  ये तुम कैसी बाते कर रहे हो संजय ,हम महाराज है ,हम किसी पर हो रहे अन्याय को कैसे चुपचाप रह कर होने दे सकते है
संजय                     अच्छा ,तब अक्ल कहाँ गई थी जब आपस में ही लडवा दिया था
संजय की बातो को अनसुना करते हुए वो आवाज़ की तरह कदम बढ़ा देते है
 
 DHIRITRASHTRA  ये क्या हो रहा है ,ये क्या हो रहा है ?इसे कोई रोकता क्यों नहीं है ?
संजय     मन ही मन ,पड़ गया फिर से दौरा ये क्या हो रहा है .
तब तक DHIRITRASHTRA  ड़ी जे  के पास पहुँच जाते है चूँकि उन्हें दिखाई तो देता नहीं है इसलिए उलटे दिशा में खड़े होकर चिल्लाना शुरू कर देते है ,उनकी इस हरकत से लोग अचंभित हो जाते है और सिक्यूरिटी हेड को बुलाया जाता है  
सिक्यूरिटी हेड        तुम लोग कौन हो ?तुम्हे  तो यहाँ नहीं बुलाया गया था
DHIRITRASHTRA  हमे कौन बुलायेगा ,हम तो अपनी मर्जी से कही से भी आते जाते है
सिक्यूरिटी हेड       अभी पुलिस को बुलाता हूँ ,तब पता चलेगा ,मर्जी से आता जाता हूँ
 संजय                ये महाराज DHIRITRASTRA  है तुम इनसे ऐसे कैसे  बात कर सकते हो ?
सिक्यूरिटी  हेड     AND  WHO  ARE U ?
संजय               ये तुम किस भाषा में हम से बात कर रहे  हो ,हम समझ में नहीं आ रहा है ,कृपया उचित भाषा का प्रयोग कर हमसे बात करे
सिक्यूरिटी हेड   मै ये पूछ रहा हूँ की तू कौण है ?
संजय              मै संजय महाराज DHIRTRASTRA की दूर द्रिस्टी
सिक्यूरिटी हेड   किसकी हिस्ट्री?
संजय               हिस्ट्री नहीं दूर द्रिष्टी ,जिसे दूर का दिखाई दे
सिक्यूरिटी हेड   कैरेक्टर से बहार आओ और बताओ यहाँ कैसे और क्यों आये?
संजय              हम यहाँ भोजन करने आए है 
सिक्यूरिटी हेड खाना ही खाना था तो खाके चुपचाप चलते बनाते न यहाँ परेशानी क्यों मचा दिया
संजय              हम तो खाने की तलाश में ही यहाँ वहां  भटक रहे थे की तभी यह चीड हरण की यह दुर्घटना हमारे महाराज से बर्दास्त नहीं हुआ  और हम इसे रोंए आ गए
गुस्से से लाल पीला होता हुआ सिक्यूरिटी गार्ड उन्हें एक जगह बिठा कर चला जाता  है,तभी वहां एक शराबी आ जाता है
शराबी           मुझे तुम दोनों से बहुत हमदर्दी है ,तुम जैसे कलाकार कहाँ मिलते है जो आने करेक्टर से बहार ही न आये.और ये कहते हुए वो महाराज को गले लगाने के लिए उनकी और     बढ़ जाता है लेकिन तभी संजय बीच में आकर उन्हें रोक देते है 
संजय          न ,न न य्गले मत लगाना ,तुम्हे शायद भीम के बारे में मालूम नहीं ,महाराज अभी बहुत गुस्से में है और अगर तुम गले लगे तो तुम्हारा तो पता भी नहीं चलेगा  
शराबी       तुहारा कहने का क्या मतलब है ,मेरी समझ में नहीं आ रहा है लेकिन एक बात है तुम लोग इन कपड़ो में बड़े जच रहे हो
DHIRITRASHTRA  इनका कहने का क्या मतलब है ,इन्हों कैसे कपडे पहन रखे है?
संजय                महाराज इन्होने तो बड़े विचत्र परिधान घारण कर रखा है ,ऐसा प्रतीत होता है की ये परिधान में घुसे हुए है
शराबी                  ये सब बाते छोड़ो ,मुझे तुम लोगो की बहुत चिंता हो रही है ये लो मोबाइल फ़ोन और अपने की को फ़ोन करके बुला लो
संजय            इन्होने घर में किसी को छोड़ा है जो बुला लू?
शराबी          लगता है तुमको ज्यादा हो गई है
संजय             क्या ज्यादा हो गई है ?
शराबी           बोतल दिखाते हुए "ये"
संजय         ये तो हमने चखी भी नहीं है      
             तभी शराबी का फ़ोन बजता है
शराबी      हेल्लो ,हाँ कौन बोल रहा है?
उधर से फ़ोन पर      मै बल रही हूँ ,तुम्हारी पत्नी माया ,घर कब तक आओगे ?
शराबी            यहाँ दो परेशां लोग है जडा उनकी परेशानी ख़तम करके आता हूँ
पत्नी           तुम से बड़ी परेशानी और क्या होगी ?और फ़ोन DISCANNECT ओ जाता है
संजय       ये क्या है ?
शराबी      ये मोबाइल है ,इससे बात हो जाती है यहाँ बैठे बैठे ,दुनिया में कही भी ,कभी भी
DHIRITRASHTRA  ये क्या कह रहे है संजय?
संजय              इनका कहने का मतलब है की जैसे मै आपकी आँख हूँ वैसे ही ये इनपर रहने वाल कान है,ये कब ,कहाँ,क्या कर रहे है ये सब इनकी पत्नी इससे जान जाती है
शराबी      तुम अपना नंबर बताओ
संजय      वो क्या होता है
शराबी         इससे मै तुम्हारा कान बन जाऊंगा 
DHIRITRASHTRA  संजय इनसे कहो की ये हमारे लिए खाने की व्यवस्था कर दे
संजय                     ये सिर्फ पीने की वयवस्था कर सकते है ,चलिए महाराज ,हम यहाँ से प्रस्थान करते है क्यूंकि ये जगह ,ये लोग बहुत ही विचत्र ला रहे है और मेरी दूर द्रिस्टी कहती है की यहाँ से चलने में ही भलाई है  क्यूंकि मुझे कुछ कुछ कारावास जैसी जगह का पुरबाभाश  हो रहा है रहा है ,हम कही और भोजन का प्रबंध करते है ,और दोनों चले जाते है
 
 
 
 
 
  
 
 


 
महाभारत के दो पात्र संजय और DHRITRASHTRA  अपने महाभारत काल से आज के युग में पहुँच जाते है ,समय के इतने लम्बे अंतराल की वजह से  यहाँ की हर विषय वस्तु उन्हें कितना आश्चर्य चकित करती है और इस परिस्तिथि में वो कैसे झेलते है इसी का एक काल्पनिक रूपांतरण मै अपने शब्दों में वर्नण करने की कोशिश कर रही हूँ
 
                             संजय और DHIRITRASHTRA  एक शादी में पहुँच जाते है
DHIRTRASHTRA -ये कौन सी और कैसी जगह है संजय?
संजय -               ये जगह कौन सी है ये तो पता नहीं महाराज परन्तु जगह बहुत ही खुबसूरत ढंग से सजा हुआ लग रहा है,चलिए अन्दर चलकर देखते है
DHIRTRASHTRA  और संजय शादी के मुख्यद्वार पर पहुँच जाते है,मुख्य द्वार पर खड़ा सिक्यूरिटी गार्ड उन्हें अजीब से वेश भूषा में देख कर उन्हें रोकता है
सिक्यूरिटी गार्ड     ऐ ,रुको ,रुको ऐसे मुह उठाये अन्दर कहाँ जा रहे हो ?
DHIRITRASHTRA ये कौन बतमीज इन्सान ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहा है ?
सिक्युरिटी गार्ड     यहाँ पर ड्रामा कंपनी वालो को नहीं बुलाया गया है ,यहाँ पर शादी हो रही है बीना आमंत्रण के अंदर नहीं जा सकते
DHIRITRASHTRA ये क्या बकवास कर रहा है ,क्या तुम्हे मालूम नहीं हम महाराजा DHIRITRASHTRA है ,हम से तमीज़ से पेश आओ
संजय                  ये महाभारत काल के महाराजा DHRITASHTRA  है
सिक्यूरिटी गार्ड    कौन से भारत के महाराजा है हमें नहीं मालुम यदि अन्दर जाना है तो थोडा माल इधर दो फिर जाने मिल जायेगा
संजय                 ये तुम किस माल की बात कर रहे हो ?
सिक्यूरिटी गार्ड    क्या सीधे अन्ना की INDIA AGENST CURRUPTION  से आ रहे हो जो बात समझ में नहीं आती ?
संजय                 ये अन्ना कौन है?
सिक्यूरिटी गार्ड   वही जो माल को इधर -उधर करने के सक्त खिलाफ है ,जो खुद तो बारह बारह दिन भूखा रखता है और हमारे पेट पर लात मरता है
संजय                हमें अन्दर जाना है और जाने दो  ,हमें बहुत तेज भूख लगी है
सिक्यूरिटी गार्ड  अन्दर जाके फोकट में  इतने मजे करोगे ,पहले कुछ दो इर जाने दे दूंगा
संजय                महाराज लगता है यहाँ जाने से फले कुछ भेंट देनी होती है ,ऐसा करते है की एक अंगूठी इस दवारपाल को दे देते है और चलते है .[और संजय अपि एक अंगूठी सिक्यूरिटी
                       गार्ड को दे देते है और अंदर को प्रस्थान करते है ]
                   संजय और DHIRITRASTRA  बहुत भूखे थे इसलिए वो सबसे पहले खाने के काउंटर की ओर जाते है ,वहां तरह तरह की चीजे थी लेकिन उनके समझ में नहीं आ रहा था की
                    क्या खाए  .सबसे पहले उन्हें CHAWMIN दिखता है
DHIRITRASHTRA   खाने को कुछ पेश करो संजय हमें बहुत तेज भूख लगी है 
संजय                खाने ओ तो बहुत कुव्ह है पर लाऊ क्या महाराज ये समझ में नहीं आ रहा है 
 DHIRITRASHTRA   क्यों ?
संजय               प्रतेक  चीज़ का सवरूप अपने आप में अनोखा है
DHIRITRASHTRA  क्या कहा धोखा है ?क्या यहाँ भी YUDHISTHIR के महल की तरह दिखता है जो होता कुछ और है,होता कुछ और है.
संजय                नहीं नहीं महाराज यहाँ एक ऐसी वस्तु है जो इतनी लम्बी है की जो लोगो के मुह के अन्दर जीतनी जाती है उतनी ही बहार रह जाती है .खाए तो खाए कैसे?
 जाना
 DHIRITRASHTRA  क्या फिर द्रौपदी की साडी जीतनी लम्बी है ?
संजय                नहीं नहीं महाराज  इतनी भी लम्बी नहीं  है 
DHIRITRASHTA  किसकी बात कर रहे हो ?तुम भी न अपनी अक्ल का इस्तेमाल नहीं करते .शब्दों में वर्णनं करके बताओ
संजय                 लम्बी तो हा परतु द्रौपदी के साडी जीतनी नहीं ,पतली है लेकिन  हमारी उंगली जितनी नहीं यह तो घुंघराले बालो जैसा प्रतीत हो रहा है परन्तु ये काले रंग का भी नहीं है
DHIRITRASHTRA  ये कैसा वर्णन है ,इसको समझना तो महाभारत की लड़ाई को समझने से भी ज्यादा मुश्किल है ,चलो कुछ जो हम खा सके और देखो,अपनी अतृप्त पेट को तरपत कर सके
संजय                    आपकी तृप्ति को शांत करने के लिए ही तो महाभारत से अब तक आपके साथ हूँ ,मन ही मन संजय सोचता है जो इतना खून पी के साथ नहीं हुआ वो अब खाने से क्या  
                            शांत होगा
तभी एक बच्चा वहां आ जाता है और उन दोनों को देखकर हँसाने लग जाता है
बच्चा                  ये आपने क्या पहन रखा है ?
संजय                     इसे वस्त्र कहते है वत्स
बच्चा                 WHAT  वास्तु एंड WHAT  वस्त्र
संजय                हे !बालक क्या तुम हमें खाने पीने की व्यवस्था की अहि जानकारी दे सकते हो ?
बच्चा               ऐ अंकल आप क्या बोल रहे हो मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है ?
संजय               हमें कच खाना है ,भूख लगी है ,खाना कहाँ मिलेगा ?
बच्चा           आप यहाँ से सीधे जाके बाये मुद जाना वहां खाने का स्टॉल है 
संजय                खाने की जगह का भी क्या नाक्शा  होता है   बालक ऐसा करो जरा हमारे साथ चलो 
बच्चा              ये हे हे क्या लगा रखा है और ये बालक बालक क्या लगा रखा है .बड़े अजीब लोग है यहाँ से तो कलटी होने में ही अपनी भलाई नज़र आती है 
                  और बच्चा वहां से चला जाता है  
                 शादी में पंडाल बहुत ही बड़ा बना हुआ था जहाँ खाने का स्टॉल बहुत दूर दूर बना हुआ था इसलिए उन्हें अन्य स्थान पर पहुचने के लिए बहुत चल चल कर जाना         पड़ता है जिससे दोनों परेशां हो जाते है 
DHIRITRASHTRA और कितनी दूर है ?संजय ,हमें खाने के लिए और कितना दूर चलना होगा ?
   संजय                महाराज लगता है ये लोग सिर्फ दिखाने  के बड़े है ,ये लोग
 खाना बचने के लिए इतनी दूर खाना रखा है की कोई वहां तक पहुँच ही न पाए 
 DHIRITRASHTRA  तो हमें पानी ही पीला दो 
संजय                     पानी भी तो कही आस पास नहीं दिख रहा है  
DHIRITRASHTRA काश! की आज अर्जुन होता तो यहाँ पर  तीर ही मार के पानी निकल कर मेरी प्यास बुझा देता ,जैसे भीष्म पितामह की बुझाई थी
संजय                     तो लड़ाई ही क्यों कराई थी ?आज इस तरह खाने पीने को तो दर दर नहीं भटक रहे होते
                      तभी उन्हें डी.जे .पर डांस कर रहे लोग दिखाई देते है
DHIRITRASHTRA   ये कैसी आवाज आ रही है ?
संजय                     एक जगह पर खड़े होकर बहुत सारे लोग अजीब तरह से हाथ पैर चला रहे है ,लगता है सोमरस का सेवन कर लिया है
DHIRITRASHTRA  अरे हमें भी वही पिला दो ,बहुत दिनों से गला तर नहीं हुआ है
संजय                     हाँ हाँ क्यों नहीं बस इसी की तो कमी रह गई थी
                          तभी वहां उन्हें वहां एक लड़की स्टेप डांस करती हुई दिखाई देती है
संजय                  महाराज यहाँ पर भी चीड़ हरण हो रहा  है
DHIRITRASHTRA  क्या द्रौपदी यहाँ भी पहुँच गई ?
संजय                     नहीं नहीं महाराज यह कन्या तो अपने वस्त्र अपने आप ही उतार रही है
DHIRITRASHTRA  ये क्या हो रहा है ?[चिलाते हुए ]
संजय                     महाराज आराम से यहाँ आपका राज -पाट नहीं है ,हम बहुत मुश्किल से भेंट देकर यहाँ तक पहुंचे है.
DHIRITRASHTRA  ये तुम कैसी बाते कर रहे हो संजय ,हम महाराज है ,हम किसी पर हो रहे अन्याय को कैसे चुपचाप रह कर होने दे सकते है
संजय                     अच्छा ,तब अक्ल कहाँ गई थी जब आपस में ही लडवा दिया था
संजय की बातो को अनसुना करते हुए वो आवाज़ की तरह कदम बढ़ा देते है
 
 DHIRITRASHTRA  ये क्या हो रहा है ,ये क्या हो रहा है ?इसे कोई रोकता क्यों नहीं है ?
संजय     मन ही मन ,पड़ गया फिर से दौरा ये क्या हो रहा है .
तब तक DHIRITRASHTRA  ड़ी जे  के पास पहुँच जाते है चूँकि उन्हें दिखाई तो देता नहीं है इसलिए उलटे दिशा में खड़े होकर चिल्लाना शुरू कर देते है ,उनकी इस हरकत से लोग अचंभित हो जाते है और सिक्यूरिटी हेड को बुलाया जाता है  
सिक्यूरिटी हेड        तुम लोग कौन हो ?तुम्हे  तो यहाँ नहीं बुलाया गया था
DHIRITRASHTRA  हमे कौन बुलायेगा ,हम तो अपनी मर्जी से कही से भी आते जाते है
सिक्यूरिटी हेड       अभी पुलिस को बुलाता हूँ ,तब पता चलेगा ,मर्जी से आता जाता हूँ
 संजय                ये महाराज DHIRITRASTRA  है तुम इनसे ऐसे कैसे  बात कर सकते हो ?
सिक्यूरिटी  हेड     AND  WHO  ARE U ?
संजय               ये तुम किस भाषा में हम से बात कर रहे  हो ,हम समझ में नहीं आ रहा है ,कृपया उचित भाषा का प्रयोग कर हमसे बात करे
सिक्यूरिटी हेड   मै ये पूछ रहा हूँ की तू कौण है ?
संजय              मै संजय महाराज DHIRTRASTRA की दूर द्रिस्टी
सिक्यूरिटी हेड   किसकी हिस्ट्री?
संजय               हिस्ट्री नहीं दूर द्रिष्टी ,जिसे दूर का दिखाई दे
सिक्यूरिटी हेड   कैरेक्टर से बहार आओ और बताओ यहाँ कैसे और क्यों आये?
संजय              हम यहाँ भोजन करने आए है 
सिक्यूरिटी हेड खाना ही खाना था तो खाके चुपचाप चलते बनाते न यहाँ परेशानी क्यों मचा दिया
संजय              हम तो खाने की तलाश में ही यहाँ वहां  भटक रहे थे की तभी यह चीड हरण की यह दुर्घटना हमारे महाराज से बर्दास्त नहीं हुआ  और हम इसे रोंए आ गए
गुस्से से लाल पीला होता हुआ सिक्यूरिटी गार्ड उन्हें एक जगह बिठा कर चला जाता  है,तभी वहां एक शराबी आ जाता है
शराबी           मुझे तुम दोनों से बहुत हमदर्दी है ,तुम जैसे कलाकार कहाँ मिलते है जो आने करेक्टर से बहार ही न आये.और ये कहते हुए वो महाराज को गले लगाने के लिए उनकी और     बढ़ जाता है लेकिन तभी संजय बीच में आकर उन्हें रोक देते है 
संजय          न ,न न य्गले मत लगाना ,तुम्हे शायद भीम के बारे में मालूम नहीं ,महाराज अभी बहुत गुस्से में है और अगर तुम गले लगे तो तुम्हारा तो पता भी नहीं चलेगा  
शराबी       तुहारा कहने का क्या मतलब है ,मेरी समझ में नहीं आ रहा है लेकिन एक बात है तुम लोग इन कपड़ो में बड़े जच रहे हो
DHIRITRASHTRA  इनका कहने का क्या मतलब है ,इन्हों कैसे कपडे पहन रखे है?
संजय                महाराज इन्होने तो बड़े विचत्र परिधान घारण कर रखा है ,ऐसा प्रतीत होता है की ये परिधान में घुसे हुए है
शराबी                  ये सब बाते छोड़ो ,मुझे तुम लोगो की बहुत चिंता हो रही है ये लो मोबाइल फ़ोन और अपने की को फ़ोन करके बुला लो
संजय            इन्होने घर में किसी को छोड़ा है जो बुला लू?
शराबी          लगता है तुमको ज्यादा हो गई है
संजय             क्या ज्यादा हो गई है ?
शराबी           बोतल दिखाते हुए "ये"
संजय         ये तो हमने चखी भी नहीं है      
             तभी शराबी का फ़ोन बजता है
शराबी      हेल्लो ,हाँ कौन बोल रहा है?
उधर से फ़ोन पर      मै बल रही हूँ ,तुम्हारी पत्नी माया ,घर कब तक आओगे ?
शराबी            यहाँ दो परेशां लोग है जडा उनकी परेशानी ख़तम करके आता हूँ
पत्नी           तुम से बड़ी परेशानी और क्या होगी ?और फ़ोन DISCANNECT ओ जाता है
संजय       ये क्या है ?
शराबी      ये मोबाइल है ,इससे बात हो जाती है यहाँ बैठे बैठे ,दुनिया में कही भी ,कभी भी
DHIRITRASHTRA  ये क्या कह रहे है संजय?
संजय              इनका कहने का मतलब है की जैसे मै आपकी आँख हूँ वैसे ही ये इनपर रहने वाल कान है,ये कब ,कहाँ,क्या कर रहे है ये सब इनकी पत्नी इससे जान जाती है
शराबी      तुम अपना नंबर बताओ
संजय      वो क्या होता है
शराबी         इससे मै तुम्हारा कान बन जाऊंगा 
DHIRITRASHTRA  संजय इनसे कहो की ये हमारे लिए खाने की व्यवस्था कर दे
संजय                     ये सिर्फ पीने की वयवस्था कर सकते है ,चलिए महाराज ,हम यहाँ से प्रस्थान करते है क्यूंकि ये जगह ,ये लोग बहुत ही विचत्र ला रहे है और मेरी दूर द्रिस्टी कहती है की यहाँ से चलने में ही भलाई है  क्यूंकि मुझे कुछ कुछ कारावास जैसी जगह का पुरबाभाश  हो रहा है रहा है ,हम कही और भोजन का प्रबंध करते है ,और दोनों चले जाते है
 
 
 
 
 
  
 
 
 
 
  
 
 
 
 
  
 
 

Wednesday, February 29, 2012

MUJHE ROTI BANANI HAI

मुझे रोटी बनानी है
रविवार की शांत, सुंदर,आरामदायक सुबह थी .हम सभी एक साथ बैठे  चाय की चुस्की के मजे ले रहे थे .मुझे मम्मीजी और तृप्ति दीदी के साथ बैठने का मौका बहुत ही कम मिलता है क्यूंकि बाकी दिनों तो ऑफिस की भागमभाग बनी रहती है.तृप्ति दीदी ने मम्मीजी से पूछा ,"मम्मीजी आज नास्ते में क्या खाना पसंद करेंगी?"
मम्मीजी ने कहा"आज आलू के पराठे बना लो "
मैंने कहा "ठीक है, आज मै बनती हूँ पराठे ,आज मेरी छुटी भी है तो मै सभी को अपने हाथो से बनाकर खिलाऊँगी "
इतना सुनते ही मम्मीजी ने कहा"साक्षी,नहीं बेटे,आज तुम रहने दो,आज तो तुम्हारे पापा ,सुनीति,प्रदीप सभी घर पर है ,तुम इतना नहीं कर पाओगी.हम फिर कभी तुम्हारे हाथ के बने पराठे खायेंगे.यह सुन कर वाही खड़ी मेरी जेठानी तृप्ति दीदी ने कटु मुस्कान के साथ मुझे देखा ,मुझ से वो मुंह से तो कुछ नहीं कहती लेकिन मुझे पता था की उनकी कटु मुस्कान के पीछे मुझे नीचे दिखने की उनकी तम्मना पूरी हो रही थी.वो बिना शब्दों के बाण चलाये यु ही हर बार मेरे दिल को छलनी कर देती थी ,मानो कह रही हो देखा ,तुम होगी डॉक्टर साक्षी भारती लेकिन इस घर की डोर तो मेरे मेरे हाथ में है.
मैंने भले ही उन्हें दीदी का दर्जा और सम्मान दिया था लेकिन वो मुझे हमेशा देवरानी ही समझती थी इसका कारण शायद मेरा  डॉक्टर होना था ,जिससे वो खुद को नीचा समझ कर मुझे हर वक्त नीचा दिखने की कोशिश में लगी रहती थी या शायद इसकी वजह यह भी हो सकती थी की वो अपनी किसी रिश्ते की बहन से अभिषेक की शादी कराना चाहती थी लेकिन अभिषेक ने अपने जीवन साथी के रूप में मुझे चुना.
मै जब शादी करके इस घर में आई थी तो सभी सदस्यों ने मुझे बड़े प्यार और इज्जत से स्वीकार किया था.मुझे शादी की अगली सुबह अब भी याद है .जब मै सुबह -सुबह उठी.मुझे शुरू से ही मम्मी ने सुबह जल्दी जागने की आदत डाल राखी थी इसलिए आदतन मेरी आँखे खुल गई.मुझे उस वक्त बहुत तेज भूख लगी थी ,सभी सो रहे थे इसलिए मैंने किसी को जगाना ठीक नहीं समझा और फ्रीज से दूध निकला और गरम करके पीने लगी .अभी गिलास आधा भी नहीं हुआ था की तृप्ति दीदी आ गई ,इससे पहले की मई उनसे अभी ये पूछती की क्या आप भी दूध पियेंगी ?उन्हाने सारे घर के लोगो के आगे मेरा तमाश बना दिया.सब को जोर -जोर से बोल के उठा दिया हाय राम ये साक्षी ने क्या किया ?बिना किसी से पूछे ,बिना किचन की पूजा हुए दूध पी लिया ,इसने तो बड़ो ओ बिना खिलाये खुद खा लिया ,बिना नहाये किचन में चली आई कम से कम पूजा तक तो रुक जाती .मै बिलकुल अचंभित खडी थी .मुझे कसूरवार ठहराया जा रहा था लेकिन क्यों ?यह बात मेरी समझ में नहीं आ रहा था ,मै रोने लगी तभी मम्मी जी ने आकर तृप्ति दीदी को चुप कराया और कहा "कोई बात नहीं बेटा ,तुम अपने कमरे में जाओ "मै अपने कमरे में आ गई ,अभिषेक से मैंने पूछा ,"मेरी गलती क्या है?"वो हंसने लगे और कहा "गलती तुम्हारी नहीं इस नए परिवेश की है जिसकी जानकारी मैंने तुम्हे पहले नहीं दी ,दरअसल नई बहु के रसोई में जाने से पहले  कुछ पूजा होती है ,लेकिन अब तुम अब इन बेस कीमती मोतियों को यु न बहाव और आराम करो , पूजा  हो जाएगी  तुम परेशां मत हो.  
                                                                                                  बात यही ख़तम हो जाती अगर मुझे रसोई पूजन के बाद खीर और पूरी न बनानी होती .खीर तो मम्मी से पुच कर विधि पूर्वक बना दी लेकिन जब आता गुन्दने की बारी आई तो बड़ी मुश्किल हो गई ,कभी आटा ज्यादा तो कभी पानी कम ,कभी पानी जयादा तो आते का घोल .मेरी आँखों में आसू आ गए पर तभी भला हो मेरी ननद का जिसने मेरा आटा गुंद दिया.लेकिन असली परीक्षा तो अभी बाकी थी इतनी नर्वस तो मै कभी ऍम बी बी एस की परीक्षा में भी नहीं हुई थी .पूरी बनाने की कोशिश करती तो कभी बेलन हाँथ से निकल जाता तो कभी पूरी चकले से फिसल जाता .तभी तृप्ति दीदी आ गई रही सही कसर उन्होंने मेरे भारत के नक्से को दिखा कर पूरी कर दी .कितनी आनंदित वो लग रही थी मुझे आपमानित करके.खैर मेरी सासु माँ ने उसी नक्से को स्वीकार करके मुझे नेग दे दिया और कहा "बहुत बढ़िया कोशिश है"मेरी सासु माँ हमेश मेरा साथ देती थी ,वो कहती थी "डॉक्टर की पढाई क्या कोई आसन काम है ,बेचारी पढ़ने में ही इतना   व्यस्त रही होगी की कहाँ समय मिला होगा रोटी सोती पर धयान देने का .प्रतेक इन्सान में कुछ कमिया और कुछ गुण होते है इसलिए हर किसी की काबिलियत की  तारीफ करनी चाहिए और गलतियों को नज़र अंदाज ,तभी रिश्ते मधुर बने  रहते है "
तब से लेकर आज तक तृप्ति दीदी ने मेरी इस कमी को अपना हथियार बना रखा है.वो मुझे कभी शब्दों से कभी कुछ नहीं जताती है लेकिन अपनी विजय मुस्कान से  मुझे अपमानित करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती .वो चाहती भी नहीं की मै रसोई में जाऊ ताकि वो अपने साम्राज्य की अकेली सम्राज्ञी बनी इतराती रहे .मै कभी हाथ बताने की कोशिश भी  करती तो दी का यही जबाब होता "तुम रहने दो न जब अपने घर में नहीं किया तो अब यहाँ क्यों तकलीफ उठाओगी?मै हूँ न !कभी कुछ कमी होतो मुझे या सेवकराम को कह दिया करो "मै किचन से आ जाती थी परन्तु मन में  दवंद चलता रहता था .मै अपमानित नहीं होकर भी ग्लानी महसूस करती रहती थी .मै घर में रह कर भी घर  की सदस्य की जैसी नहीं महसूस कर पाती थी लेकिन यह भी नहीं समझ पा रही थी की इसमे गलती किसकी और क्या है ?कहाँ चुक हुई है और  इसे कैसे पाटा  जाये .मेरे मम्मी पापा दोनों डॉक्टर थे इसलिए मैंने भी बचपन से ही डॉक्टर बनने के अलावा और कुछ सोच ही नहीं .मम्मी को  भी  कभी कभी ही किचन का काम करते देखा था इसलिए मेरी ललक कभी उस तरफ उभरी ही नहीं तब मुझे भी कहाँ पता था की किचन में जाना और रोटी नहीं बनाना आना मुझे इतना उपेक्षित कर देगा .मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं थी.पर अपने आप में ही मुहे ऐसा लगता था जैसे कोई शहरी  गाव में जाकर "हौआ" बन जाता है या कोई ग्रामीण शहर में आकर अलग थलग पड़ जाता है ,जबकि दोष ग्रामीण या शहरी होने का नहीं होता है बल्कि नए परिवेश का होता है .मै जब भी अभिषेक से इस बात पर विचार  विमर्श करने की कोशिश करती तो उसका यही कहना होता "यार ,यूमे तो खुश होना चाहिए की तुम्हरी कमियों के लिए कोई तुम्हे ताना तो नहीं मारता ,खुश रहा करो "
पर मै कैसे खुश रह सकती थी जब मुझे अपने ही स्थान पर अपनी जड़ो को फ़ैलाने में मुश्किल हो रही थी .मै मम्मी -पापा को भी परेशान नही करना चाह रही थी इसलिए मैंने अपनी सहेली हेमा से इस विषय में बात की .मैंने कहा "क्या रोटी बनाना आना इतना जरुरी है ?"
हेमा ने कहा "जब हम दसवी की परीक्षा देते है तो क्या किसी एक विषय में उतीर्ण होना काफी होता है ?नहीं न?हर विषय में पास होने लायक तो अंक चाहिए ही होता है न ,उसी तरह जीवन में हर पहलू पर थोड़ी -बहुत तो पकड़ होनी ही चाहिए और रोटी तो जीवन का आधार है,वैसे इसमे तुम्हारा या हमारा दोष नहीं है यह तो परिवेश और माहौल में हो रहे बदलाव का नतीजा है "
हेमा ने मुझे कुकरी क्लास ज्वाइन करने की सलाह दी .मैंने भी निश्चय किया की कोई कुकरी क्लास ज्वाइन आरके बिल्कुल परफेक्ट आलू का परांठा बनाउंगी.आखिर मै एक औरत हूँ ,शक्ति का स्रोत हूँ ,मै किसी से कैसे पीछे रह सकती हूँ ?और फिर भविष्य में मुझे भी तो अपनी बेटी को सिखाना होगा .फिर मै एक गहरी और निश्चिंत नींद सो गई क्यूंकि कल जल्दी उठ कर सूरज की नई किरण से अपना दिन शुरू करना था  
  

Monday, February 27, 2012

TERI ANKHO KE SIVA DUNIYA ME RAKHA KYA HAI

जिंदगी कितनी खुबसूरत,कितनी हसीन हो जाती है जब प्यार होता है .प्यार तो है ही ऐसे शै का नाम जिसे लेते ही हर किसी के होटों पर मुस्कराहट की एक लकीर खीच जाती है .प्यार की शबनम से भींगे दो दिल दिन -दुनियां से बेखबर बस अपनी ही भावना में बहते चले जाते है ,न रास्ते की फ़िक्र ,न मंजिल की तलाश .ऐसा ही कुछ हाल था नमिता और नरेश का.खूबसूरती का बेमिशाल नमूना थी -नमिता .काली बड़ी बड़ी बोलती आँखे ,जो देखे बस उन आँखों में ही खो जाये . लम्बा कद ,कमसिन अदा ,सुनहरे बाल ,गोरा रंग .इस हुस्न की मल्लिका को जब कोई देखता हर किसी के  दिल में पहला ख्याल यही आता की भगवान ने इसे कितनी फुर्सत के पलो में अपनी सर्वोतम कृति समझ कर बनाया होगा .नमिता एक सुपर मोडल थी और एक फैशन शो के दौरान उसकी मुलाकात एक बहुत बड़े उद्योगपति नरेश सिंघानिया से हुई थी .कमी तो नरेश सिंघानिया में भी नहीं थी .किसी सपनों का राजकुमार लगता था  जाने कितनी हसिनाये भी उसकी एक निगाह के लिए तरसती थी .लेकिन नरेश सिंघानिया को जिसने पहली ही नजर में अपना दीवाना बना दिया था ,वो थी नमिता सूरी.
नमिता सूरी और नरेश सिंघानिया के प्यार के चर्चे जल्द ही अखबार की सुर्खिया बटोरने लगे क्यूंकि जब इन दोनों के दिल मिले तो इन्होने दिन दुनिया  के खौफ से बेकौफ होकर एक दुसरे के प्यार को स्वीकार किया .एक बिंदास जिंदगी के सफ़र पर वो निकल चले थे ,हर अंजाम से बे खबर ,बहती नदी की धरा की तरह उन्मुक्त प्यार के बहाव में वो दोनों भी बहे जा रहे थे .खुला आसमान भी कम पड़ने लगा था उन्हें अपने प्यार ने उड़ान भरने के लिए.प्यार तो प्यार होता है ,जिसकी  तो कोई सीमा होती है न कोई गहराई होती है .नरेश ,नमिता के प्यार में पागल उस पर अपनी खुशिया लुटता रहता .एक बार नरेश नमिता के लिए हीरे का हार लाता है और बड़े प्यार से पहनाने लगता है तो नमिता कहती है "क्या बात है इन महंगे तोहफों से मुझे रिझाने की कोशिश कर रहे हो "
तो नरेश कहता है "नहीं,मुझे जिस खूबसूरती को अपना बनाने का मौका मिला है उसे और ज्यादा सवारने की कोशिश कर रहा हूँ
दोनों प्यार के प्यार भरे दिल अपनी ही दुनिया में मगन प्रेम धुन की धुनी रमाये जा रहे थे .नरेश नमिता की आँखों का दीवाना था बस उसकी झील सी आँखों में खोया रहता था उसे नमिता की आँखों के सिवा दुनिया की कोई चीज़ नज़र नहीं आती ,अपना सूद बुद उसने इन आँखों के हवाले कर दिया था .जब इस दिन प्रति दिन बदती मुहब्बत का असर अपने चरम पर पहुँच रहा था तो इसके फैलाती जड़ो को रोकने के लिए एक शख्स का आगमन हुआ जिसका नाम था सुमन सिंघानिया ,सुमन नरेश की पत्नी थी ,नरेश और सुमन के दो बच्चे भी थे .
सुमन ने  नरेश को बहुत समझाने की कोशिश की ,उसे ये अहसास दिलाले की कोशिश की  कि उस पर दो बच्चो कि जिमेदारी है ,उसका व्यापार बीना उसके बर्बादी के कगार पर जा पहुंचा है ,परन्तु इन सारी बातो का नरेश पर कोई असर नहीं हुआ उल्टा वो सुमन से कहता है "तुम सारा रुपया ,पैसा ,धन दौलत ,जायदाद बच्चे सब ले लो बस मुझे छोड़ दो "
सुमन समझ जाती है कि ये प्यार का नशा है जो इतनी आसानी से उतरने वाला नहीं बेचारी सुमन निराश हाथो के साथ वापस  जाती है 
सुमन के लिए अब उसकी असल  परीक्षा कि घडी थी ,सही मायने में ये उसके संघर्ष का समय था उसे अब हर हाल में खुद को साबित करना था अपने से ज्यादा अपने बच्चो के लिए .सुमन का प्यार उसके बच्चे थे जिनको इस परिस्थिथि का आभास कराये बीना अछे से पालना था,सही परवरिश देनी थी .उसे पता था कि ये रास्ता आसन नहीं था परन्तु आगे तो बढ़ाना ही था क्यूंकि पीछे को तो कोई रास्ता ही नहीं जाता था.
प्यार नरेश को अर्श से फर्श पर ला रहा था .वह प्यार में तो सीढियाँ चढ़ाता जा रहा था लेकिन जिंदगी के गर्त में गिरता जा रहा था .जिसकी जिमेदार जाने अनजाने नमिता खुद महसुस करने लगी थी .सुमन ने भी जाते जाते नमिता के दिल में एक शक का नस्तर  चुभो गई थी .ये कह कर कि आदमी का प्यार तो एक पंक्षी के सामान है आज अगर इसने मेरे घोसले को छोड़ कर तुम्हारे यहाँ बसेरा बनाया है तो कल को ये चंचल मन का पंक्षी कही और भी हुस्न का दाना देखकर अपना ठिकाना कही और भी तलाश कर सकता है.मुझे नरेश से कोई शिकायत नहीं है क्यूंकि उसकी तो मति भ्रष्ट हो चुकी है और मेरे पास तो मेरे दो बच्चे है ,मेरी जीने की वजह है ,पर तुम अपना भविष्य सोचो और हो सके तो तुम ही संभल जाओ ताकि सबो की जिंदगी सुधर जाये .

नमिता बहुत पेशोपेश में थी क्यूंकि नरेश ने जब उससे अपने प्यार का इजहार किया था तो उसने अपने आप को एक खुली किताब की तरह नमिता के सामने खुद को खोल कर रख दिया था .नमिता से नरेश ने इतना जरुर कहा था "मुझे तुम से इस हद तक मोहब्बत हो गई है की मेरी जिंदगी की सुबह शाम तुम हो ,मेरी हर धड़कन तुम्हारे नाम से धड़कती है ,तुम मेरी रूह में  शामिल हो चुकी हो ,मैंने तुमसे प्यार किया है करता रहुँगा,तुम मेरे प्यार को स्वीकार करो या न करो ये तुम्हारी मर्जी है लेकिन मेरी मर्जी पर अब मेरा बस नहीं रहा "इसी मासूमियत पर तो मर मिटी थी नमिता हवास
नमिता जब भी नरेश को समझाने की कोशिश करती ,उसे उसकी जिमेदारी का अहसास करने की कोशिश करती ,नरेश का एक ही कहना था होता था की मुझे कुछ भी करने को कहो पर एक पल के लिए भी मुझे अपनी आखो से मुझे जुदा मत करो ,मै दीवाना हूँ इन आँखों का इन उठती -गिरती पलको का
सुमन ने नमिता को बताया की व्यापार नरेश के व्यक्तिगत व्यवहार की वजह से काफी नुक्सान उठा रहा है और अगर यही हाल रहा तो एक दिन चाहे सुमन कितनी भी कोशिश कर ले व्यापार ख़तम हो जायेगा .सुमन की हर कोशिश के बाबजूद वो व्यापार को वो रुतबा नहीं दिला पा रही जो नरेश की वजह से था क्यूंकि को सिर्फ रूपए पैसे से नहीं बल्कि व्यक्ति विशेष के विश्वास की भी जरुरत होती है और अब तो घर के सदस्यों को भी नरेश की कमी महशुस    होने लगी है .
नमिता को इस बात की गंभीरता समझ  रही थी इसलिए नमिता अपने दूर जाने की धमकी पर नरेश को ऑफिस जाने को मजबूर कराती है लेकिन नरेश की भी एक शर्त होती है की नमिता भी हर पल उसके साथ रहेगी .नमिता शर्त मान लेती है और नरेश का साथ देने के लिए हर पल उसके साथ साये की तरह रहने लगाती है
लेकिन ये बात ऑफिस कर्मचारी ,बिजनेस एसोसियेट को नागवार गुजरने लगती है क्यूंकि नरेश का लिया हुआ कोई भी निर्णय अब सही परिणाम नहीं दे रहा था और सब को लगता था की इसकी वजह नमिता है और कही न कही नमिता भी यह महसूस करने लगी थी.वो जब भी नरेश को कुछ समझाने की कोशिश की वो व्यापार पर ध्यान दे तो नरेश का यही कहना होता -नमिता ,तुम्हारी आँखों के सीवा अब मुझे किसी भी चीज़ की समझ नहीं रही.मुझे तुमसे प्यार है और मेरी सोच तुम तक ही सीमित होकर रह गई है 
                                                    नमिता हकीकत समझ चुकी थी लेकिन उसके प्यार का ये अंजाम होगा उसने ऐसा तो कभी नहीं चाहा था की नरेश उसके प्यार में गर्दिश का सितारा बन जाये .उसका प्यार कही बदनाम  हो जाये .जो लोग उसे इज्जत की निगाह से देखते है वही हंसी का पात्र बना कर उसका मजाक  बनाय.न जाने ऐसे कितने ही खयालो को हकीकत का रूप न मिल जाय इसलिए अपने प्यार की इज्जत ,,दुनिया में प्यार की हैसियत को बरक़रार रखने के लिए वो एक ठोस इरादा करती है और कही चली जाती है
                                               नरेश पागलो की तरह उसे तलाशने की तमाम कोशिशो में लग जाता है लेकिन उसकी सारी कोशिशे असफल साबित होती है .कुछ दिनों के बाद नरेश को एक उपहार मिलाता है नमिता की तरफ से .नरेश उसे बहुत उत्साह के साथ चूमता हुआ खोलता है लेकिन उसे खोलते ही उसके हाथ -पाव ठन्डे हो जाते है ,उफ़ !ये क्या ,उसमे तो नमिता की वही दो आँखे थी जिसका नरेश दीवाना था .हाय राम ये तुने क्या कर दिया नमिता !
फिर      तो नरेश की आंखे पत्थर की हो गई ,वो बचा कूचा भी होश भी गवा बैठा.नरेश पागल हो गया .बच्चे अपने पापा की इस अवस्था को देख खौफ से रोने लगते है ,बुड़े माँ-बाप अपनी जिंदगी का आज सबसे मजबूर दिन को जीने मजबूर थे .सुमन भी रो रही थी ,वह हर जतन कर रही थी की किसी तरह से नरेश ठीक हो जाये पर सब बेकार क्यूंकि नरेश बेहोशी में भी एक ही बात दोहराय जा रहा था -तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है .....!